CBSE Class 12 Hindi कविता/कहानी/नाटक की रचना प्रक्रिया

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CBSE Class 12 Hindi कविता/कहानी/नाटक की रचना प्रक्रिया

(क) कैसे बनती है कविता

प्रश्न 1.
कविता लेखन से संबंधित दो मत क्या हैं?
उत्तर:
पहला मत-पहला मत यह है कि कविता लेखन की कोई निश्चित प्रणाली नहीं होती। न ही कविता लेखन की कोई प्रणाली बताई अथवा सिखाई जा सकती है। कविता तो मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी होती है और इसे एक भावुक और संवेदनशील हृदय ही लिख सकता है। कविता केवल भावुक हृदय में ही उमड़ सकती है इसे चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला आदि की तरह सिखाया नहीं जा सकता चित्रकला को रंग, कूची, कैनवास आदि तथा संगीत कला को लय स्वर, ताल, वाद्य आदि उपकरणों के माध्यम से सिखाया जा सकता है।

किंतु कविता में इस प्रकार के कई उपकरण नहीं होते। कविता को किसी बाह्य उपकरण की सहायता से सिखाया नहीं जा सकता। कवि अपनी संवेदनाओं को कविता के रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरा मत-दूसरा मत यह है कि चित्रकला, संगीतकला आदि के समान कविता लेखन को भी सिखाया जा सकता है। भारत तथा पश्चिमी देशों के कुछ विश्व-विद्यालयों में काव्य लेखन से संबंधित प्रशिक्षण दिए जाते हैं। इस प्रकार चित्र, संगीत, नृत्य आदि कलाओं के समान कविता लेखन को भी अभ्यास के द्वारा सीखा जा सकता है। कविता के बार-बार पढ़ने तथा विषय के जानने से कवि की संवेदनाओं के निकट पहुंचा जा सकता है। इस मत के मानने वालों का विचार है कि उचित प्रशिक्षण तथा अभ्यास के द्वारा कविता लेखन सरलता से किया जा सकता है।

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प्रश्न 2.
कविता-लेखन में शब्दों का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
कविता लेखन में शब्दों का बहुत महत्त्व हैं जो इस प्रकार है:
(i) शब्द कविता के मूल आधार होते हैं।
(ii) शब्दों की सहायता से ही कविता लेखन संभव हो सकता है।
(iii) शब्द ही कविता लेखन के सर्वोत्तम और प्राथमिक उपकरण है।
(iv) शब्दों के उचित मेल से ही कविता बनती है।
(v) कवि की संवेदनाएँ अमूर्त होती हैं जिन्हें शब्दों के द्वारा ही मूर्त रूप प्रदान किया जाता है।
(iv) कविता लेखन में कवि शब्दों को छंदबद्ध करता है जैसे
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !
हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी
जल्दी-जल्दी चलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

प्रश्न 3.
कविता में बिंबों की क्या भूमिका है ?
उत्तर:
बिंब का अर्थ-बिंब का शाब्दिक अर्थ है-शब्द चित्र अर्थात् जिन शब्दचित्रों के माध्यम से कवि अपनी कल्पना को साकार रूप प्रदान करता है उन्हें बिंब कहते हैं। कविता में बिंबों की भूमिका-कविता में बिंबों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जो निम्नलिखित है :—
(i) बिंब ही कवि की कल्पना को साकार रूप प्रदान करते हैं।
(ii) बिंब के द्वारा ही आंतरिक संवेदनाएँ कविता के रूप में प्रकट होती हैं।
(iii) ये अमूर्त को मूर्त रूप प्रदान करते हैं ; जैसे : जनता का दुःख एक, हवा में उड़ती पताकाएँ अनेक।

प्रश्न 4.
छंद से क्या तात्पर्य है तथा कविता की रचना में छंद का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
छंद से तात्पर्य वर्ण, मात्रा, यति, गति, लय आदि के सुव्यवस्थित एवं सुसंगठित रूप को छंद कहते हैं। कविता में छंद का महत्त्व :-कविता की रचना में छंद की बहुत महत्त्व है जो इस प्रकार है:
(i) छंद कविता के अनिवार्य तत्त्व हैं।
(ii) ये कविता को संगीतात्मकता प्रदान करते हैं।
(iii) ये कविता को कविता का रूप प्रदान करते हैं।
(iv) ये कविता को प्रवाहमयता प्रदान करते हैं।
(v) ये कविता को गेयता प्रदान करते हैं।
(vi) ये कविता को माधुर्य प्रदान करते हैं।
उदाहरण के लिए:
गुरु गोबिन्दो दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय॥

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प्रश्न 5.
कविता के महत्त्वपूर्ण घटक कौन-कौन से हैं ? अथवा कविता के प्रमुख घटकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कविता के कुछ महत्त्वपूर्ण घटक होते हैं जिनके बिना कविता संभव नहीं होती। ये घटक निम्नलिखित हैं :
(i) भाषा
(ii) शैली
(iii) बिंब
(iv) छंद
(v) अलंकार
(i) भाषा-भाषा कविता का महत्त्वपूर्ण घटक है क्योंकि भाषा के माध्यम से ही कवि अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
(ii) शैली-शैली भी कविता का प्रमुख घटक है। इसके द्वारा कवि अपनी संवेदनाओं को कविता के रूप में अभिव्यक्त करता है।
(iii) बिंब-बिंब का शाब्दिक अर्थ है-शब्दचित्र। इन शब्द चित्रों के माध्यम से ही कवि अपनी कल्पना को साकार रूप प्रदान करता है। बिंब के बिना कविता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह कविता का मूल आधार है।
(iv) छंद-यह कविता का अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है क्योंकि छंद ही कविता को कविता का रूप प्रदान करते हैं। इनके द्वारा ही कविता पद्य की श्रेणी में आते हैं।
(v) अलंकार-अलंकार भी कविता के प्रमुख घटक हैं। ये कविता को सौंदर्य प्रदान करते हैं। इनके द्वारा ही कवि अपनी कविता को सजाता है।

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
आपने अनेक कविताएँ पढ़ी होंगी। उनमें से आपको कौन-सी कविता सबसे अच्छी लगी ? लिखिए। यह भी बताइए कि आपको वह कविता क्यों अच्छी लगी ?
उत्तर:
मैंने अनेक कविताएँ पढ़ी हैं। इनमें से मुझे जयशंकर प्रसाद जी की निम्नलिखित कविता सबसे अच्छी लगी है
“अरुण! यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरू शिखा मनोहर, छिटका जीवन-हरियाली पर मंगल कुमकुम सारा।
लघु सुरधनु से पंख पसारे शीतल मलय समीर सहारे, उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़, निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल, लहरें टकराती अनंत की-पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढलकाती सुख मेरे, मदिर ऊँघते रहते जब जग कर रजनी भर तारा।”
मुझे यह कविता इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि इसमें राष्ट्र के प्रति सम्मान का भाव व्यक्त किया गया।
भारतवर्ष को असीम प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण देश बताया गया है जहाँ सबका सदा स्वागत होता है।
भाषा तत्सम प्रधान है।
संपूर्ण कविता में संगीत के गूंजते हुए स्वर
सुनाई देते हैं।
प्रकृति का मानवीकरण किया गया।
रूपक, उपमा, अनुप्रास अलंकारों की छटा निराली है।

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प्रश्न 2.
आपके जीवन में अनेक ऐसी घटनाएँ घटी होंगी जिन्होंने आपके मन को छुआ होगा। उस अनुभूति को कविता के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए।
उत्तर:
जेठ की तपती दोपहरी में एक रिक्शा वाले को रिक्शा चलाते देख कर मन में उत्पन्न भावनाओं को कविता के रूप में इस प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है
‘वह आता, चिल्लाता
रिक्शावाला।
जीर्णवसन, मलिन तन
धूल-विमर्दित पग नगन
बिखरे केश सिर जलन
बहते स्वेद सिक्त तन
ठठरी-सा गात
औ’ पेट पीठ से चिपकाता
वह आता।
तप्त तवे-सी तपती भू
शेष स्वांस सी चलती लू
मध्यान्ह रवि बरसाता आग
आशा में कुछ कमाने की
वह आता, चिल्लाता
रिक्शावाला। -डॉ० रत्लचंद्र शर्मा

प्रश्न 3.
शब्दों का खेल, परिवेश के अनुसार शब्द-चयन, लय, तुक, वाक्य संरचना, यति-गति, बिंब, संक्षिप्तता के साथ-साथ विभिन्न अर्थ स्तर आदि से कविता बनती है। दी गई कविता में इनकी पहचान कर अपने शब्दों में लिखें
एक जनता का
दुःख एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।
दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि, मजूर घर भर।
एक जनता का -अमरवर,
एकता का स्वर। ..
अन्यथा स्वातंत्र्य इति।
उत्तर:
कवि ने आधुनिक काव्य-शिल्प का प्रयोग करते हुए भाव जगत् में गागर में सागर भरने का सफल प्रयोग किया है। शब्द चयन के उचित प्रयोग ने जनता की पीड़ा और व्यथा को ही प्रकट नहीं किया बल्कि उसकी विवशता और विद्रोह को भी वाणी प्रदान की है। कवि ने जनता को एक विशेषण उसकी प्रमुखता और असहायता को प्रकट किया है। हवा में उड़ती पताकाएँ उसके विरोध की प्रतीक हैं। इसमें गतिशील बिंब योजना की गई है।

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अनेक शब्द का विशेष अर्थ है कि असहायों और पीड़ितों की संख्या बहुत बड़ी है। ‘दैन्य दानव’, ‘क्रूर स्थिति’, ‘कंगाल बुद्धि’ संक्षिप्त होने पर भी अपने भीतर व्यापकता के भावों को समेटे हुए हैं। अन्यथा स्वातंत्र्य इति’ में लाक्षणिकता विद्यमान है जो बोध कराती है कि भूखे-नंगे व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। वह इंसान के लिए तभी महत्त्वपूर्ण हो सकती है जब उसका पेट भरा हुआ हो। तत्सम शब्दावली की अधिकता है। अतुकांत छंद का प्रयोग होने पर भी भावगत लयात्मकता की सृष्टि हुई है। तुक का स्वाभाविक प्रयोग एक स्थान पर किया गया है।

(ख) कैसे लिखें कहानी

प्रश्न 1.
कहानी की परिभाषा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिभाषा–कहानी साहित्य की एक ऐसी गद्य विधा है जिसमें जीवन के किसी एक अंग विशेष का मनोरंजन पूर्ण चित्रण किया जाता है। कहानी एक ऐसी साहित्यिक विधा है, जो अपने सीमित क्षेत्र में पूर्ण एवं स्वतंत्र है, प्रभावशाली है। कहानी में मानव जीवन की कथा होती है। अलग-अलग विद्वानों और लेखकों ने कहानी की विभिन्न परिभाषाएं दी हैं परंतु कहानी की परिभाषा को लेकर एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते। प्रेमचंद ने कहानी की परिभाषा इस प्रकार दी है “कहानी एक रचना है, जिसमें जीवन के किसी अंग किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य होता है। उसका चरित्र, शैली तथा कथा विन्यास सब उसी भाव को पुष्ट करते हैं।” अर्थात् किसी घटना पात्र या समस्या का क्रमबद्ध ब्योरा जिसमें परिवेश हो, वंद्वात्मकता हो, कथा का क्रमिक विकास हो, चरम उत्कर्ष का बिंदु हो, उसे कहानी कहा जा स

प्रश्न 2.
कहानी के तत्व कौन-कौन से हैं ?
अथवा
कहानी की तात्विक समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
कहानी साहित्य की एक गद्ध विधा है। इसके प्रमुख तत्व इस प्रकार हैं
1. कथानक अथवा कथावस्तु,
2. पात्रयोजना अथवा चरित्र-चित्रण
3. संवाद योजना अथवा कथोपकथन
4. देशकाल और वातावरण
5. उद्देश्य
6. भाषा शैली।

1. कथानक अथवा कथावस्तु-यह कहानी का पहला और सर्वप्रथम तत्व है। कहानी में आरंभ से अंत तक जो कुछ कहा जाए उसे . कथानक अथवा कथावस्तु कहते हैं। कहानी में घटित होने वाली घटनाएं ही उसका कथानक होता है। यह कहानी का मूलाधार होता है। इसे आरंभ, मध्य और अंत तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।

2. पात्र-योजना अथवा चरित्र-चित्रण-यह कहानी का दूसरा प्रमुख तत्व है। कहानी में पात्र योजना कथानक के अनुरूप होना चाहिए। कहानी में नायक और नायिका दो प्रमुख पात्र होते हैं। अन्य इनके सहायक पात्र होते हैं। पात्रों के द्वारा ही लेखक अपना उद्देश्य स्पष्ट करता है और समाज को संदेश देता है।

3. संवाद-योजना अथवा कथोपकथन-संवाद का शाब्दिक अर्थ है-परस्पर बातचीत। कहानी में पात्रों के बीच हुई परस्पर बातचीत को – संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। यह कहानी का तीसरा प्रमुख तत्व होता है। संवाद पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करते हैं तथा कहानी का विकास करते हैं। इसलिए संवाद योजना, सहज, सरल, स्वाभाविक तथा पात्रानुकूल होनी चाहिए।

4. देशकाल और वातावरण–यह कहानी का चौथा प्रमुख तत्व होता है। देशकाल और वातावरण से तात्पर्य परिस्थितियों और समय से है। इनके द्वारा कहानी में घटित घटनाओं की परिस्थितियों तथा वातावरण का बोध होता है। कहानी में देशकाल वातावरण कथानक के अनुरूप होना चाहिए तथा घटनाओं से समन्वय होना चाहिए।

5. उद्देश्य-यह कहानी का पाँचवां प्रमुख तत्व है। साहित्य में कोई भी रचना निरुद्देश्य नहीं होती। प्रत्येक रचना का अपना कोई-न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। इस प्रकार कहानी भी एक उद्देश्यपूर्ण रचना है। कहानी में लेखक अपने पात्रों के माध्यम से अपना उद्देश्य स्पष्ट करता है।

6. भाषा शैली-यह कहानी का छटा और महत्त्वपूर्ण तत्व है। कहानी में भाषा शैली सरल, सहज, स्वाभाविक, पात्रानुकूल और विषयानुकूल होनी चाहिए। इसमें सहज और सामान्य शब्दावली का प्रयोग होना चाहिए।

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प्रश्न 3.
कहानी में पात्रों अथवा चरित्रों का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
कहानी में पात्रों अथवा चरित्रों का बहुत महत्त्व है जो इस प्रकार हैं
1. पात्र कहानी के मूलाधार होते हैं।
2. पात्र कहानी को गतिशीलता प्रदान करते हैं।
3. पात्र कहानी का उद्देश्य स्पष्ट करते हैं।
4. पात्र पाठकों को संदेश देते हैं।
5. पात्र कहानी को समापन की ओर ले जाते हैं।

प्रश्न 4.
कहानी में संवाद योजना कैसी होनी चाहिए ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
1. कहानी में संवाद योजना सहज और सरल होनी चाहिए।
2. संवाद योजना स्वाभाविक होनी चाहिए।
3. संवाद योजना पात्रानुकूल होनी चाहिए।
4. संवाद योजना विषयानुकूल होनी चाहिए।
5. संवाद योजना रोचक होनी चाहिए।
6. संवादं योजना संक्षिप्त होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
कहानी में पात्रों के द्वंद्व का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
कहानी में पात्रों के दवदव का बहुत महत्त्व है जो इस प्रकार हैं
1. पात्रों का द्वंद्व कथानक को गतिशीलता प्रदान करता है।
2. पात्रों के द्वंद्व से ही पात्रों के चरित्र का उद्घाटन होता है।
3. पात्रों के द्वंद्व से ही कहानी का उद्देश्य स्पष्ट होता है।
4. पात्रों के द्वंद्व से ही लेखक पाठकों को संदेश देता है।
5. पात्रों के द्वंद्व से ही कहानी में रोचकता उत्पन्न होती है।
6. पात्रों के द्वंद्व से ही पाठकों में जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 6.
कहानी की भाषा शैली कैसी होनी चाहिए ?
अथवा कहानी की भाषा शैली की क्या विशेषताएँ हैं ?
उत्तर:
कहानी की भाषा शैली की विशेषताएँ निम्नलिखित होनी चाहिए
1. भाषा शैली सरल और सहज होनी चाहिए।
2. भाषा शैली स्वाभाविक होनी चाहिए।
3. भाषा शैली पात्रानुकूल होनी चाहिए।
4. भाषा शैली विषयानुकूल होनी चाहिए।
5. भाषा शैली प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।
6. भाषा शैली सरल होनी चाहिए।

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प्रश्न 7.
कहानी का हमारे जीवन से क्या संबंध है ?
उत्तर:
कहानी का मानवीय जीवन से घनिष्ठ संबंध है। आदिम युग से ही कहानी मानव जीवन का प्रमुख अंग रही है। यह मानवीय जीवन का एक ऐसा अभिन्न अंग है कि प्रत्येक मनुष्य किसी-न-किसी रूप में कहानी सुनता और सुनाता है। विचारों का आदान-प्रदान इस संसार का एक अनूठा नियम है। इसलिए इस संसार में प्रत्येक मनुष्य में अपने अनुभव बांटने और दूसरों के अनुभव जानने की प्राकृतिक इच्छा होती है। यहाँ प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों, अनुभवों और वस्तुओं का आदान-प्रदान करता है। हम अपनी बातें किसी को सुनाना और दूसरों की सुनना चाहते हैं। इसलिए यह सत्य है कि इस संसार में प्रत्येक मनुष्य में कहानी लिखने की मूल भावना होती है।

यह दूसरा सत्य है कि कुछ लोगों में इस भावना का विकास हो जाता है और कुछ इसे विकसित करने में समर्थ नहीं होते। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कहानी का मानवीय जीवन से अटूट संबंध है।

प्रश्न 8.
कहानी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्पष्ट कीजिए।
अथवा
कहानी के इतिहास पर नोट लिखिए।
उत्तर:
कहानी का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानवीय इतिहास है क्योंकि कहानी मानवीय स्वभाव और प्रकृति का अटूट हिस्सा है। कहानी सुनने और सुनाने की प्रवृत्ति मनुष्य में आदिम युग से है। जैसे-जैसे मानवीय सभ्यता का विकास होता गया वैसे-वैसे कहानी की आदिम कला का विकास होता रहा। कथावाचक कहानियाँ सुनाते गए और श्रोता उनकी कहानियाँ सुनते गए।

प्राकृतिक रूप से मनुष्य एक कल्पनाशील प्राणी है। कल्पना करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। धीरे-धीरे सत्य घटनाओं पर आधारित … (कथा) कथा-कहानी सुनते-सुनाते मनुष्य में कल्पना का सम्मिश्रण होने लगा क्योंकि प्रायः मनुष्य वह सुनना चाहता है जो उसे प्रिय है। .. प्राचीन काल में किसी घटना, युद्ध, प्रेम आदि के किस्से सुनाए जाते थे और श्रोता इन किस्से कहानियों को आनंदपूर्वक सुनते थे। धीरे धीरे ये किस्से ही कहानियों का रूप (धारण) ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार कहानी कला का धीरे-धीरे विकास हुआ।

प्रश्न 9.
प्राचीन काल में मौखिक कहानी की लोकप्रियता के क्या कारण थे ?
उत्तर:
प्राचीन काल में मौखिक कहानी की लोकप्रियता के कई कारण थे जो इस प्रकार हैं
1. प्राचीन काल में संचार के साधनों की कमी थी इसलिए मौखिक कहानी ही संचार का सबसे बड़ा पम थी।
2. प्राचीन काल में मौखिक कहानी धर्म प्रचारकों और संतों के सिद्धांतों और विचारों को लोगों तक पहुँचाने का माध्यम थी।
3. मौखिक कहानी ही समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार का साधन थी।
4. प्राचीन काल में मौखिक कहानी ही मनोरंजन का प्रमुख साधन थी।

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प्रश्न 10.
कहानी का केंद्र बिंदु कथानक होता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कहानी में प्रारंभ से अंत तक घटित सभी घटनाओं को कथानक कहते हैं। कथानक कहानी का प्रथम और महत्त्वपूर्ण तत्व होता है। यह कहानी का मूलाधार होता है। इसे कहानी का प्रारंभिक नक्शा भी कहते हैं। जिस प्रकार कोई मकान बनाने से पहले उसका नक्शा बनाया जाता है। उसी प्रकार कहानी लिखने से पहले उसका कथानक लिखा जाता है। कथानक ही कहानी का केंद्र बिंदु होता है। सामान्यत: कथानक किसी घटना, अनुभव अथवा कल्पना पर आधारित होता है।

कभी कहानीकार । की बुद्धि में पूरा कथानक आता है और कभी कहानी का एक सूत्र आता है। केवल एक छोटा-सा प्रसंग अथवा पात्र कहानीकार को आकर्षित करता है। इसलिए कोई एक प्रसंग भी कहानी का कथानक हो सकता है और कोई एक छोटी-सी घटना भी कथानक की प्रमुख घटना हो सकती है। उसके बाद कहानीकार उस घटना अथवा प्रसंग का कल्पना के आधार पर विस्तार करता है। यह सत्य है कि कहानीकार की कल्पना कोरी कल्पना नहीं होती। यह कोई असंभव कल्पना नहीं होती बल्कि ऐसी कल्पना होती है जो संभव हो सके। कल्पना के विस्तार के लिए लेखक के पास जो सूत्र होता है उसके माध्यम से ही कल्पना आगे बढ़ती है।

यह सूत्र लेखक को एक परिवेश, पात्र और समस्या प्रदान करता है। उनके आधार पर लेखक संभावनाओं पर विचार करता है और एक ऐसा काल्पनिक ढांचा तैयार करता है जो संभव हो सके और लेखक के उद्देश्यों सरे भी मेल खा सके। सामान्यत: कथानक में प्रारंभ, मध्य और अंत के रूप में कथानक का पूर्ण स्वरूप होता है। संपूर्ण कहानी कथानक के इर्द-गिर्द घुमती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कथानक कहानी का केंद्र बिंदु होता है।

प्रश्न 11.
देशकाल और वातावरण का कहानी लेखन में किस प्रकार आवश्यक है ?
उत्तर:
देशकाल और वातावरण कहानी का महत्त्वपूर्ण तत्व होता है। इसका कथानक से सीधा संबंध होता है। जब कहानीकार कहानी के कथानक का स्वरूप बना लेता है। तब वह कथानक को देशकाल और वातावरण के साथ जोड़ता है। देशकाल और वातावरण कहानी को प्रामाणित और रोचक बनाने में बहुत आवश्यक है। कहानी लेखन में (पात्र) प्रत्येक घटना और पात्र का समस्या का अपना देशकाल. और वातावरण होता है। यदि कथानक की घटनाएँ देशकाल और वातावरण से मेल नहीं खातीं तो वह कहानी असफल सिद्ध होती है। इसलिए कहानीकार जिस परिवेश से कहानी के कथानक को जोड़ना चाहता उसे उस परिवेश की पूरी जानकारी होनी चाहिए। इसलिए हम कह सकते हैं कि देशकाल और वातावरण का कहानी लेखन में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
चरित्र-चित्रण के कई तरीके होते हैं। ईदगाह’ कहानी में किन-किन तरीकों का इस्तेमाल किया गया है ? इस कहानी में आपको सबसे प्रभावी चरित्र किस का लगा और कहानीकार ने उसके चरित्र-चित्रण में किन तरीकों का उपयोग किया है ?
उत्तर:
कहानी में किसी भी पात्र का चरित्र-चित्रण उसके क्रिया-कलापों, संवादों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा उससे संबंधित बोले गए संवादों से होता है। लेखक स्वयं भी किसी पात्र की चारित्रिक विशेषताओं को उजागर करने के लिए कुछ संकेत दे देता है। ‘ईदगाह’ कहानी में लेखक ने पात्रों के चरित्र-चित्रण के लिए इन सभी तरीकों का प्रयोग किया है। ‘ईदगाह’ कहानी का पात्र ‘हामिद’ हमें सबसे अधिक प्रभावित करता है। लेखक ने हामिद का परिचय देते हुए लिखा है-वह चार पाँच साल का गरीब सूरत दुबला पतला लड़का।

जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। लेखक ने संवादों के माध्यम से भी हामिद के चरित्र को स्वर प्रदान किया है। हामिद का मेले से चिमटा खरीदना उसके मन में अपनी दादी के प्रति संवेदनाओं को व्यक्त करता है। उसे रोटी पकाते समय दादी के हाथ के जलने की चिंता रहती थी, इसलिए उसने चिमटा खरीदा। हामिद का मिठाई और मिट्टी के खिलौनों पर पैसे बर्बाद न करना उसकी समझदारी को व्यक्त करता है। इस प्रकार ‘ईदगाह’ कहानी में लेखक ने स्वयं, संवादों के माध्यम से तथा अन्य बच्चों के वार्तालापों से हामिद का चरित्र-चित्रण किया है।

CBSE Class 12 Hindi कविता/कहानी/नाटक की रचना प्रक्रिया

प्रश्न 2.
संवाद कहानी में कई महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है। महत्त्व के हिसाब से क्रमवार संवाद की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कहानी में संवादों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। संवाद कहानी को गति प्रदान करते हैं। कहानी में चित्रित पात्रों का चरित्र-चित्रण संवादों के माध्यम से होता है। जो घटना अथवा प्रतिक्रिया कहानीकार होती हुई नहीं दिखा सकता उसे संवादों के द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है। संवादों से पात्रों के बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक स्तरों का ज्ञान भी हो जाता है। उदाहरण के लिए ‘ईदगाह’ कहानी मुस्लिम परिवेश को व्यक्त करती है इसलिए इसके संवादों में उर्दू के शब्दों की अधिकता है। अधिकतर संवाद बच्चों के हैं इसलिए बच्चों की कल्पनाओं को भी पूरी तरह से उभारा गया है। जैसे-जिन्नात को मिलने वाले रुपयों के बारे में मोहसिन और हामिद का यह वार्तालाप- ‘मोहसिन ने कहा-जिन्नात को रुपयों की क्या कमी ? जिस ख़जाने में चाहें, चले जायें।’ हामिद ने फिर पूछा-जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं। मोहसिन-एक-एक का सिर आसमान के बराबर होता है। इस वार्तालाप से बच्चों के भोलेपन, कौतुहल आदि चारित्रिक गुणों का भी पता चलता है। संवाद पात्रों के स्तर के अनुरूप, सरल, सहज, स्वाभाविक, संक्षिप्त तथा अवसरानुकूल होने चाहिए। अनावश्यक रूप से लंबे संवाद कथानक में गतिरोध उत्पन्न कर देते हैं।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए चित्रों के आधार पर चार छोटी-छोटी कहानियाँ लिखें।
CBSE Class 12 Hindi कविता कहानी नाटक की रचना प्रक्रिया 1
एक दिन राम घर में घूम रहा था और उसकी माँ अपना काम कर रही थीं। अचानक उसकी माँ की नज़र उसके शहीद पति मेजर करण सिंह पर पड़ी। उसने राम को बुलाते हुए कहा कि क्या तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता का देहांत कब हुआ था ? उनको मरे हुए एक वर्ष हो गया था। राम ने बिल्कुल ठीक-ठाक जवाब दे दिया। उसकी माँ ने उसे उन्हें प्रणाम करने को कहा। दोनों ने उनको प्रणाम किया और भगवान् से प्रार्थना की कि अगले जन्म में वे ही हमारे परिवार के सदस्य बनें। उनके परिवार में शहीद की पत्नी और उनका आठ साल का लड़का राम रहते थे। राम ने बड़े ही आदर से अपनी माँ से पूछा कि उनका देहांत कैसे हुआ था। उसकी माँ ने बताया कि दुश्मनों को मारते-मारते वह खुद भी चल बसे। उन्होंने वहाँ दीपक जलाया और वापस अपने-अपने कामों में लग गए।
CBSE Class 12 Hindi कविता कहानी नाटक की रचना प्रक्रिया 2

चोर बना शरीफ
CBSE Class 12 Hindi कविता कहानी नाटक की रचना प्रक्रिया 3

एक रात एक चोर किसी के घर चोरी करके आया था। जाते-जाते उसने देखा कि एक सरकारी नौकर पेड़ काट रहा था। रात बहुत हो चुकी थी। सारा शहर सो गया था। कोई वाहन सड़क पर नहीं था। केवल वह चोर और वह पेड़ काटने वाला ही सड़क पर थे। चोर ने सारा तमाशा एक कोने में खड़े होकर देखा। पहले तो वह बहुत खुश हो रहा था। लेकिन बाद में जब उसने सारा पेड़ काट दिया तो उसके पत्थर दिल में थोड़ी हमदर्दी उस पेड़ के लिए आई। धीरे-धीरे उस चोर का दिल मोम की तरह पिघल गया। उसने सोचा कि यह पेड़ हमें छाया देते हैं। यह उसे काटे जा रहा है। उसने चोरी किया हुआ समान वापस उस घर में रखा जहाँ से उसने चोरी की थी। वापस आकर देखा तो सारा पेड़ कट चुका था और वह आदमी वहीं उसे काट कर सो गया था। चोर ने अपनी बंदूक साथ के तालाब में फेंक . दी और प्रण लिया कि वह सारे बुरे काम छोड़ देगा और एक आम आदमी बन कर रहेगा। उसने अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। उसे दस साल की जेल हुई। बाहर आने पर उसने कुछ कमाने के लिए टी-स्टाल खोल लिया और खुशी-खुशी जीने लगा।

CBSE Class 12 Hindi कविता/कहानी/नाटक की रचना प्रक्रिया

घर में आग
CBSE Class 12 Hindi कविता कहानी नाटक की रचना प्रक्रिया 4

राजू और उसकी माँ हर रोज़ की तरह अपना-अपना काम कर रहे थे। उसकी माँ फोन पर बात कर रही थी और वह बाहर खेल रहा था। वह घर पर आया और सीधा रसोई की तरफ चल पड़ा। वह बहुत प्यासा था। गैस खुली हुई थी। उसने जैसे ही लाइट का स्विच ऑन किया वैसे ही धमाका हुआ और रसोई में आग लग गई। उसने चिल्लाना शुरू कर दिया- ‘बचाओ-बचाओ।’ उसकी माँ ने आवाज़ सुनी और वह घबरा गई। वह मदद के लिए आस-पास के घरों में भागी। लेकिन कोई मदद करने को तैयार नहीं था। उसने फोन उठाया और 102 पर डॉयल किया। फॉयर-ब्रिगेड को आने में पंद्रह मिनट लगने थे। उसने आग बुझाने की पूरी कोशिश की लेकिन आग धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। राजू बेहोश हो गया था। उसकी माँ को डर था कि वह मर न गया हो। अचानक फॉयरब्रिगेड आई और उसने आग .. बझा दी। राज को फौरन अस्पताल पहँचा दिया गया। थोडे दिनों में ही वह ठीक हो गया और फिर से खेलने लगा। उसकी माँ ने सीखा कि कभी भी गैस खुली नहीं छोड़नी।

रोहित एक आठ साल का लड़का है। उसे पढ़ना बहुत पसंद था लेकिन जब से उसके घर में नया टी० वी० आया तब से वह सारे काम छोड़कर टी० वी० देखता रहता है। उसने पढ़ना तक छोड़ दिया। उसे अब पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। वह सारा दिन एकटक आँखें लगाए टी० वी० देखता रहता था। वह चौबीस घंटों में से कम-से-कम दस घंटे टी० वी० देखता रहता था। उसका दिमाग़ अब वैसे ही सोचने लगता जैसे वह टी० वी० में देखता था। वह स्कूल से बहुत छुट्टी लेता था।

वह अपने दोस्तों से भी लड़ता रहता था। वह दिन भर टी०वी० देखते-देखते पतला होता जा रहा था। वह जल्द ही बीमार हो जाता था। उसके माता-पिता जी ने सोच लिया कि वह टी० उन्होंने केबल काट भी दी। वह बहत रोने लगा। वह पूरा एक दिन रोता रहा। उसकी माँ ने उसे समझाया कि ज़्यादा टी० वी० देखने से आँखें ख़राब हो जाती हैं, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता, स्कूल जाने का मन नहीं करता। जो उसकी माँ ने उसे समझाया वह सब समझ गया और उसने अपनी माँ से वादा किया कि वह अब एक घंटे से ज्यादा टी० वी० नहीं देखेगा। उसका पढ़ाई में ध्यान लगना शुरू हो गया और वह फिर कक्षा में अच्छे अंक लेने लगा। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें ज़्यादा टी० वी० नहीं देखना चाहिए, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 4.
एक कहानी में कई कहानियाँ छिपी होती हैं। किसी कहानी को किसी खास मोड़ पर रोकर नयी स्थिति में कहानी को नया मोड़ दिया जा सकता है। नीचे दी गई परिस्थिति पर कहानी लिखने का प्रयास करें “सिद्धेश्वरी ने देखा कि उसका बड़ा बेटा रामचंद्र धीरे-धीरे घर की तरफ आ रहा है। रामचंद्र माँ को बताता है कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई।” आगे की कहानी आप लिखिए।
उत्तर:
सिद्धेश्वरी ने देखा कि उसका बड़ा बेटा रामचंद्र धीर-धीरे घर की तरफ आ रहा है। रामचंद्र माँ को बताता है कि उसे अच्छी नौकरी मिल गई। सुनते ही माँ खुशी से झूम उठी और आंगन की ओर दौड़ पड़ी। वहाँ चारपाई पर लेटे हुए अपने पति को जगाकर कहती है-सुनते हो!
“अपने राम को अच्छी नौकरी मिल गई है।”
राम के पिता ऊँघते हुए उठ बैठते हैं और राम को अपने पास बैठा कर उससे पूछते हैं-कहाँ नौकरी मिली है ?
राम-मल्होत्रा बुक डिपो में। पिता-क्या वेतन मिलेगा ?
राम-पाँच हजार रुपए।
यह सुनते ही राम के पिता और माता उस पर न्योछावर हो उठते हैं। उन्हें लगता है कि अब तो उनके दिन फिर जाएंगे और घर में …
खुशहाली आ जाएगी। राम के पिता मिठाई लेने बाहर निकल जाते हैं और माँ राम को प्यार से खाना खिलाने लग जाती है।

(ग) नाटक लिखने का व्याकरण

प्रश्न 1. नाटक किसे कहते हैं ?
उत्तर:
साहित्य की वह विधा जिसके पढ़ने के साथ-साथ अभिनय भी किया जा सकता है उसे नाटक कहते हैं। भारतीय काव्य शास्त्र में नाटक को दृश्य काव्य माना जाता है। नाटक रंगमंच की एक प्रमुख विधा है। इसलिए इसे पढ़ा, सुना और देखा भी जा सकता है।

प्रश्न 2.
नाटक में चित्रित पात्र कैसे होने चाहिए ?
उत्तर:
नाटक में पात्रों का बहुत महत्त्व है नाटक में चित्रित पात्र निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:
(i) पात्र चरित्रवान होने चाहिए।
(ii) पात्र आदर्शवादी होने चाहिए।
(iii) पात्र अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होने चाहिए।
(iv) पात्र जीवंत तथा जीवन से जुड़े होने चाहिए।
(v) पात्र सामाजिक परिवेश से जुड़े होने चाहिए।
(vi) पात्र कथानक से संबंधित होने चाहिए।

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प्रश्न 3.
नाटक की भाषा-शैली कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर:
नाटक की भाषा-शैली निम्नलिखित प्रकार की होनी चाहिए :
(i) नाटक की भाषा-शैली सरल और सहज होनी चाहिए।
(ii) इसकी भाषा-शैली स्वाभाविक तथा प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।
(iii) इसकी भाषा-शैली पात्रानुकूल होनी चाहिए।
(iv) इसकी भाषा-शैली विषयानुकूल होनी चाहिए।
(v) इसकी भाषा-शैली संवादों के अनुकूल होनी चाहिए।
(vi) इसकी भाषा-शैली सरस होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
नाटक और साहित्य की अन्य विधाओं में क्या अंतर है ? संक्षेप में बताइये।
उत्तर:
साहित्य में कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विधाएँ आती हैं। नाटक भी साहित्य की एक प्रमुख विधा है किंतु नाटक तथा अन्य विधाओं में बहुत अंतर है जो इस प्रकार है :
(i) नाटक को दृश्य काव्य कहा जाता है किसी अन्य विधा को नहीं।
(ii) नाटक रंगमंच की एक विधा है किसी अन्य विधाओं के अंतर्गत कोई रंगमंच नहीं आता।
(iii) नाटक का अभिनय होता है जबकि अन्य विधाओं का अभिनय नहीं हो सकता।
(iv) नाटक को पढ़ा, सुना तथा देखा जा सकता है जबकि अन्य विधाओं को केवल पढ़ा तथा सुना जा सकता है।
(v) नाटक में अभिनय का गुण विद्यमान होता है जबकि अन्य विधाओं में यह गुण नहीं होता।
(vi) नाटक का संबंध दर्शकों से है जबकि अन्य विधाओं का संबंध पाठकों से है।
(vii) नाटक एक ‘दर्शनीय’ विधा है जबकि अन्य पाठनीय विधाएँ हैं।

प्रश्न 5.
नाटक के विभिन्न तत्वों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
नाटक की रचना में विभिन्न तत्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान है जो निम्नलिखित है :
(i) कथानक / कथावस्तु-नाटक में जो कुछ कहा जाए उसे कथानक अथवा कथावस्तु कहते हैं। यह नाटक का सबसे महत्त्वपूर्ण . तत्व है इसी के आधार पर नाटक की मध्य और समापन मुख्यतः तीन भागों में बांटा जा सकता है।
(ii) पात्र योजना / चरित्र चित्रण-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है। पात्रों के माध्यम से ही नाटककार कथानक को गतिशीलता प्रदान करता है। इनके माध्यम से ही यह नाटक का उद्देश्य स्पष्ट करता है। नाटक में एक प्रमुख पात्र तथा अन्य उसके सहायक पात्र होते हैं। प्रमुख पात्र को नायक अथवा नायिका कहते हैं।
(iii) संवाद. योजना अथवा कथोपकथन-संवाद का शाब्दिक अर्थ है-परस्पर बातचीत अथवा नाटक में पात्रों की परस्पर बातचीत को संवाद अथवा कथोपकथन कहते हैं। संवाद योजना नाटक का प्रमुख तत्व है इसके बिना नाटक की कल्पना भी नहीं की जा सकती। संवाद ही कथानक को गतिशील बनाते हैं तथा पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करते हैं। नाटक में संवाद योजना सहज, सरल, स्वाभाविक तथा पात्रानुकूल होना चाहिए।
(iv) अभिनेयता-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसके द्वारा ही नाटक का मंच पर अभिनय किया जाता है। अभिनेयता के कारण ही नाटक अभिनय के योग्य बनता है।
(v) उद्देश्य-साहित्य की अन्य विधाओं के समान नाटक भी एक उद्देश्य पूर्ण रचना है। नाटककार अपने पात्रों के द्वारा इस उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
(vi) भाषा-शैली-यह नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्व है क्योंकि इसके माध्यम से ही नाटककार अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करता है। नाटक की भाषा-शैली सरल, सहज, स्वाभाविक, पात्रानुकूल तथा प्रसंगानुकूल होनी चाहिए।

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प्रश्न 6.
कथानक को कितने भागों में बाँटा गया है ?
उत्तर:
कथानक को तीन भागों में बाँटा गया है
(i) आरंभ
(i) मध्य
(iii) समापन।

प्रश्न 7.
नाटक में स्वीकार एवं अस्वीकार की अवधारणा से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
नाटक में स्वीकार के स्थान पर अस्वीकार का अधिक महत्त्व होता है। नाटक में स्वीकार तत्व के आ जाने से नाटक सशक्त हो जाता है। कोई भी दो चरित्र जब आपस में मिलते हैं तो विचारों के आदान-प्रदान में टकराहट पैदा होना स्वाभाविक है। रंगमंच में कभी भी यथास्थिति को स्वीकार नहीं किया जाता। वर्तमान स्थिति के प्रति असंतुष्टि, छटपटाहट, प्रतिरोध और अस्वीकार जैसे नकारात्मक तत्वों के समावेश से ही नाटक सशक्त बनता है। यही कारण है कि हमारे नाटककारों को राम की अपेक्षा रावण और प्रहलाद की अपेक्षा हिरण्यकश्यप का चरित्र अधिक आकर्षित करता है। इसके विपरीत जब-जब किसी विचार, व्यवस्था या तात्कालिक समस्या को किसी नाटक में सहज स्वीकार किया गया है, वह नाटक अधिक सशक्त और लोगों के आकर्षण का केंद्र नहीं बन पाया है।

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
‘नाटक की कहानी बेशक भूतकाल या भविष्यकाल से संबद्ध हो, तब भी उसे वर्तमान काल में ही घटित होना पड़ता है-इस धारणा के पीछे क्या कारण हो सकते हैं ?’
उत्तर:
नाटक को दृश्य काव्य माना जाता है। इसे दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। प्रत्येक नाटक का एक निश्चित समय-सीमा में . समाप्त होना भी आवश्यक है। साहित्य की अन्य विधाओं जैसे-कहानी, उपन्यास, कविता, निबंध को पढ़ने के लिए हम अपनी सुविधा के अनुसार समय निकाल सकते हैं। एक ही कहानी को कई दिनों में थोड़ा-थोड़ा पढ़कर समाप्त कर सकते हैं परंतु नाटक को तो दर्शकों ने एक निश्चित समय-सीमा में एक ही स्थान पर देखना होता है।

नाटककार अपने नाटक का कथ्य भूतकाल से ले अथवा भविष्यकाल से उसे उस नाटक को वर्तमान काल में ही संयोजित करना होता है। कैसा भी नाटक हो उसे एक विशेष समय में, एक विशेष स्थान पर और वर्तमान काल में ही घटित होना होता है। कोई भी पौराणिक अथवा ऐतिहासिक कथानक भी न आँखों के सामने वर्तमान में ही घटित होता है। इसलिए नाटक के मंच-निर्देश वर्तमान काल में ही लिखे जाते हैं। इन्हीं कारणों से नाटक की कहानी बेशक भूतकाल या भविष्यकाल से संबद्ध हो उसे वर्तमान काल में ही घटित होना पड़ता है।

प्रश्न 2.
‘संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों। स्थिति और परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हैं तो उनके दर्शक तक संप्रेक्षित होने में कोई मुश्किल नहीं है’ क्या आप इससे सहमत हैं ? पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
हम इस कथन से सहमत हैं कि संवाद चाहे कितने भी तत्सम और क्लिष्ट भाषा में क्यों न लिखे गए हों। स्थिति और परिवेश की माँग के अनुसार यदि वे स्वाभाविक जान पड़ते हैं तो उनके दर्शक तक संप्रेषित होने में कोई मुश्किल नहीं होती। इसका प्रमुख कारण यह है कि दर्शक नाटक देख रहा है। वह मानसिक रूप से उस युग के परिवेश में पहुंच जाता है जिससे संबंधित वह नाटक है। पौराणिक कथानकों पर आधारित नाटकों में तत्सम प्रधान शब्दावली को भी वह अभिनेताओं के अभिनय, हाव-भाव, संवाद बोलने के ढंग से समझ जाता है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के नाटकों में पिताश्री, भ्राताश्री, माताश्री शब्दों का प्रयोग बच्चे-बच्चे को स्मरण हो गया था। इसी प्रकार से जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, सुरेंद्र वर्मा आदि के नाटकों में प्रयुक्त शब्दावली भी परिवेश के कारण सहज रूप से हृदयंगम हो जाती है।

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प्रश्न 3.
समाचार-पत्र के किसी कहानीनुमा समाचार से नाटक की रचना करें।
उत्तर:
राँची दिनांक 24 मार्च-पैसों की तंगी के कारण रमेश ने अपनी पुत्री अलका का विवाह रोक दिया था कि उसके मित्र सुरेश ने उसकी बेटी के विवाह का सारा भार अपने ऊपर लेकर उसका विवाह निश्चित तिथि पर कराया। आज के युग में मित्रता की ऐसी मिसाल कम ही दिखाई देती है। सुरेश की इस पहल पर मुहल्ले वालों ने भी रमेश की सहायता की। इस समाचार का नाट्य रूपांतरण निम्नलिखित होगा (स्थान घर का बरामदा। रमेश सिर पकड़ कर बैठा है। उसकी पत्नी पूनम और पुत्री अलका भी उदास बैठे हैं)

पूनम – (रमेश को समझाते हुए) कोई बात नहीं, धंधे में नफा-नुकसान होता रहता है। अभी कुछ दिन की मोहलत माँग लेते हैं। लड़के वाले मान ही
जाएँगे। – (रूंधे स्वर में) अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो यह विवाह रोकना ही होगा। (तभी दौड़ता हुआ सुरेश वहाँ आता)
सुरेश – अरे ! रमेश! मैं यह क्या सुन रहा हूँ ? अलका का विवाह नहीं होगा।
रमेश – (मंद स्वर में) क्या करूँ-व्यापार में घाटा पड़ गया है। सब कुछ समाप्त हो गया।
सुरेश – (आवेश में) क्या मैं मर गया हूँ ? अलका मेरी भी तो बेटी है। मैं करूँगा उसका विवाह ।
पूनम – इसे कहते हैं मित्र। दिल में कसक उठी तो आया भागा-भागा। (उसी समय वहाँ मुहल्ले के कुछ लोग आ जाते हैं।)
एक बुजुर्ग – रमेश घबराओ मत अलका हम सबकी बेटी है। हम सब मिलकर इसका विवाह करेंगे। क्यों भाइयो ? (सब समवेत स्वर में हाँ करेंगे कहते हैं और पर्दा गिरता है।)

प्रश्न 4.
(क ) अध्यापक और शिष्य के बीच गृह-कार्य को लेकर पाँच-पाँच संवाद लिखिए।
(ख) एक घरेलू महिला एवं रिक्शा चालक को ध्यान में रखते हुए पाँच-पाँच संवाद लिखिए।
उत्तर.
(क)
अध्यापक – रमेश, तुमने गृह-कार्य किया है ?
शिष्य – नहीं, मास्टर जी।
अध्यापक – क्यों नहीं किया।
शिष्य – मैं किसी कारण से नहीं कर पाया।
अध्यापक किस कारण से नहीं कर पाए ?
शिष्य – कल हमारे घर कुछ अतिथि आ गए थे।
अध्यापक – तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो ?
शिष्य – नहीं, मास्टर जी।
अध्यापक – कल गृह-कार्य ज़रूर करके लाना।
शिष्य – जी, मास्टर जी। ज़रूर करके आऊँगा।

(ख)
घरेलू महिला – रिक्शा ! ओ रिक्शा वाले !
रिक्शा चालक – हाँ! मेम साहब।
घरेलू महिला – अशोका कलोनी चलोगे ?
रिक्शा चालक – हाँ, चलूँगा।
घरेलू महिला – कितने पैसे लोगे ?
रिक्शा चालक – जी, दस रुपये।
घरेलू महिला – दस रुपये तो ज्यादा हैं ?
रिक्शा चालक – क्या करें मेम साहब, महँगाई बहुत है।
घरेलू महिला – ठीक है, ठीक है। आठ रुपये ले लेना।
रिक्शा चालक – चलो, मेम साहब, आठ ही दे देना।

(घ) कैसे करें कहानी का नाट्य रूपांतरण

प्रश्न 1.
कहानी और नाटक में अंतर स्पष्ट कीजिए। . (HR. 2013 Set-C, 2014 Set-B)
अथवा कहानी और नाटक में क्या-क्या असमानताएँ हैं ?
उत्तर:
कहानी और नाटक दोनों गद्य विधाएं हैं। इनमें जहां कुछ समानताएँ हैं वहाँ कुछ असमानताएँ या अंतर भी हैं जो इस प्रकार है
कहानी
1. कहानी एक ऐसी गद्य विधा है जिसमें जीवन के किसी अंक विशेष का मनोरंजन पूर्ण चित्रण किया जाता है।
2. कहानी का संबंध लेखक और पाठकों से होता है।
3. कहानी कहीं अथवा पढ़ी जाती है।
4. कहानी को आरंभ, मध्य और अंत के आधार पर बांटा जाता है।
5. कहानी में मंच सज्जा, संगीत तथा प्रकाश का महत्त्व नहीं है।

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नाटक:
1. नाटक एक ऐसी गद्य विधा है जिसका मंच पर अभिनय किया जाता है।
2. नाटक का संबंध लेखक, निर्देशक, दर्शक तथा श्रोताओं से है।
3. नाटक का मंच पर अभिनय किया जाता है।
4. नाटक को दृश्यों में विभाजित किया जाता है।
5. नाटक में मंच सज्जा, संगीत और प्रकाश व्यवस्था का विशेष महत्त्व होता है।

प्रश्न 2.
कहानी को नाटक में किस प्रकार रूपांतरित किया जा सकता है ? (HR. 2012 Set-A, 2013 Set-B)
उत्तर:
कहानी को नाटक में रूपांतरित करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है जो इस प्रकार है
अभिव्यक्ति और माध्यम –
1. कहानी की कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित किया जाता है।
2. कहानी में घटित विभिन्न घटनाओं के आधार पर दृश्यों का निर्माण किया जाता है।
3. कथावस्तु से संबंधित वातावरण की व्यवस्था की जाती है। ..
4. ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है।
5. कथावस्तु के अनुरूप मंच सजा और संगीत का निर्माण किया जाता है।
6. पात्रों के द्वव को अभिनय के अनुरूप परिवर्तित किया जाता है।
7. संवादों को अभिनय के अनुरूप स्वरूप प्रदान किया जाता है।
8. कथानक को अभिनय के अनुरूप स्वरूप प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 3.
नाट्य रूपांतरण में किस प्रकार की मुख्य समस्या का सामना करना पड़ता है ? (HR. 2012 Set-C, 2014 Set-A, 2015 Set-C)
अथवा
नाट्य रूपांतरण करते समय कौन-कौन सी समस्याएँ आती हैं ?
उत्तर:
नाटय रूपांतरण करते समय अनेक समस्याओं का सामना करना पडता है. जो इस प्रकार है
1. सबसे प्रमुख समस्या कहानी के पात्रों के मनोभावों को कहानीकार द्वारा प्रस्तुत प्रसंगों अथवा मानसिक वंवों के नाटकीय प्रस्तुति में आती है।
2. पात्रों के द्वंद्व को अभिनय के अनुरूप बनाने में समस्या आती है।
3. संवादों को नाटकीय रूप प्रदान करने में समस्या आती है।
4. संगीत ध्वनि और प्रकाश व्यवस्था करने में समस्या होती है।
5. कथानक को अभिनय के अनुरूप बनाने में समस्या होती है।

प्रश्न 4.
कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर:
कहानी अथवा कथानक का नाट्य रूपांतरण करते समय निम्नलिखित आवश्यक बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. कथानक के अनुसार ही दृश्य दिखाए जाने चाहिए।
2. नाटक के दृश्य बनाने से पहले उसका खाका तैयार करना चाहिए।
3. नाटकीय संवादों का कहानी के मूल संवादों के साथ मेल होना चाहिए।
4. कहानी के संवादों को नाट्य रूपांतरण में एक निश्चित स्थान मिलना चाहिए।
5. संवाद सहज, सरल, संक्षिप्त, सटीक, प्रभावशैली और बोलचाल की भाषा में होने चाहिए।
6. संवाद अधिक लंबे और ऊबाऊ नहीं होने चाहिए। . (HR. 2011 Set-A)

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प्रश्न 5.
कहानी के पात्र नाट्य रूपांतरण में किस प्रकार परिवर्तित किये जा सकते हैं ?
उत्तर:
कहानी के पात्र नाट्य रूपांतरण में निम्न प्रकार से परिवर्तित किये जा सकते हैं
1. नाट्य रूपांतरण करते समय कहानी के पात्रों की दृश्यात्मकता का नाटक के पात्रों से मेल होना चाहिए।
2. पात्रों की भावभंगिमाओं तथा उनके व्यवहार का भी उचित ध्यान रखना चाहिए।
3. पात्र घटनाओं के अनुरूप मनोभावों को प्रस्तुत करने वाले होने चाहिए।
4. पात्र अभिनय के अनुरूप होने चाहिए।
5. पात्रों का मंच के साथ मेल होना चाहिए।

प्रश्न 6.
कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय दृश्य विभाजन कैसे करते हैं ?
उत्तर:
कहानी का नाट्य रूपांतरण करते समय दृश्य विभाजन निम्न प्रकार से करते हैं
1. कहानी की कथावस्तु को समय और स्थान के आधार पर विभाजित करके दृश्य बनाए जाते हैं।
2. प्रत्येक दृश्य कथानक के अनुसार बनाया जाता है।
3. एक स्थान और समय पर घट रही घटना को एक दृश्य में लिया जाता है।
4. दूसरे स्थान और समय पर घट रही घटना को अलग दृश्यों में बांटा जाता है।
5. दृश्य विभाजन करते समय कथाक्रम और विकास का भी ध्यान रखा जाता है।

पाठ से संवाद

प्रश्न 1.
कहानी और नाटक में क्या समानता होती है ?
उत्तर:
.CBSE Class 12 Hindi कविता कहानी नाटक की रचना प्रक्रिया 5

प्रश्न 2.
स्थान और समय का ध्यान में रखते हुए ‘दोपहर का भोजन’ कहानी को विभिन्न दृश्यों में विभाजित करें। किसी एक दृश्य का
संवाद भी लिखें।
उत्तर:
‘दोपहर का भोजन’ कहानी में पहला दृश्य सिद्धेश्वरी के घर की दयनीय दशा और टूटी खाट पर लेटा उस का सब से छोटा बेटा। दूसरे
दृश्य में सिद्धेश्वरी का बार-बार दरवाजे से गली में आते-जाते को देखना। तीसरे दृश्य में थकेहारे रामचंद्र का आकर हताश-सा बैठना
और खाना खाना। मोहन के संबंध में बातचीत करना। अगले दृश्य में रामचंद्र का भोजन करके चले जाना और मोहन का खाना-खाने के लिए आना। माँ-बेटे की बातचीत। मोहन भोजन करके जाता है।

अगले दृश्य में चंद्रिका प्रसाद का परेशान मुद्रा में आना। भोजन करना पति-पत्नी का वार्तालाप। अगले दृश्य में सिद्धेश्वरी का खाना खाने बैठना। सोए हुए पुत्र को देखना आधी रोटी उसके लिए रखना। अंतिम दृश्य में आँसू बहाते हुए सिद्धेश्वरी का भोजन करना, घर में मक्खियों का भिनभिनाना और चंद्रिका प्रसाद का निश्चिततापूर्वक सोना। दृश्य तीन (रामचंद्र थकाहारा-सा घर में आता है। सिद्धेश्वरी उसके हाथ-पैर धुलवाती है। वह पटरा लेकर बैठ जाता है। सिद्धेश्वरी उसके सामने थाली में खाना लगा रख देती है।)

सिद्धेश्वरी-खाना खाओ बेटा!
(रामचंद्र चुपचाप खाना खाने लगता है। सिद्धेश्वरी उसे पंखा झलने लगती है।)

सिद्धेश्वरी-दफ्तर में कोई बात हो गई है क्या ?
रामचंद्र-नहीं तो, रोज़ जैसा ही था।
सिद्धेश्वरी-इतने चुप क्यों हों ?
रामचंद्र- लाला काम इतना लेता है पर पैसे देते हुए मरता है।
सिद्धेश्वरी-कोई बात नहीं, जब तक कहीं और काम नहीं मिलता सहन करना ही पड़ेगा।
रामचंद्र-वह तो है ही।
(सिद्धेश्वरी उसे और रोटी लेने के लिए कहती है पर वह सिर हिलाकर इनकार कर देता है। रामचंद्र हाथ धोकर बाहर निकल जाता है।)

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प्रश्न 3.
कहानी के नाट्य रूपांतरण में संवादों का विशेष महत्त्व होता है। नीचे ईदगाह कहानी से संबंधित कुछ चित्र दिए जा रहे हैं। इन्हें देखकर संवाद लिखें।
उत्तर:
नाट्य रूपांतरण
महमूद (पैसे गिनते हुए)-अरे, सुन। मेरे पास पूरे बारह पैसे हैं।
मोहसिन-और मेरे पास तो पंद्रह हैं। तेरे पास कितने हैं, हामिद ?
हामिद-अभी तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। अभी जाता हूँ घर, और लेकर आता हूँ दादी जान से।
महमूद-हाँ, हाँ। भाग कर जा। ईदगाह जाना है। बहुत दूर है वह यहाँ से।
हामिद-(कोठरी के दरवाजे से)-दादी जान। सब मेला देखने जा रहे हैं। मुझे भी पैसे दो। मैं भी मेला देखने जाऊँगा।
अमीना (आँखें पोंछते हुए)-बेटा इतनी दूर वहाँ कैसे जाएगा ?
हामिद (उत्साहपूर्वक)-सब के साथ। सभी तो जा रहे हैं।
अमीना (बटुआ खोलते हुए) ले बेटा, तीन पैसे हैं।
संभल कर जाना। सब एक साथ रहना।
हामिद (उत्साह में भर कर)-नहीं दादी हम इकट्ठे ही रहेंगे।
मोहसिन-अरे तेज़-तेज़ चलो। हमें वहाँ जल्दी पहुँचना है। अरे देख तो ……..।
महमूद-कितने मोटे-मोटे आम लगे हैं इन पेड़ों पर।
हामिद-लीचियाँ भी लगी हैं।
मोहसिन-तोड़ें, इन्हें।
हामिद-अरे, नहीं। माली पीटेगा।

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